रिपोर्ट: ओम साहू
जगदलपुर। वर्षों से चले आ रहे छत्तीसगढ़-ओडिशा के इंद्रावती-जोरानाला जल विवाद में अब समाधान की किरण नजर आ रही है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और जल संसाधन मंत्री केदार कश्यप की भगीरथी पहल से बस्तर की जीवनरेखा कही जाने वाली इंद्रावती नदी में जल प्रवाह फिर से बढ़ने लगा है। अब छत्तीसगढ़ को इंद्रावती से उसके हिस्से का 49 प्रतिशत पानी मिलने लगा है, जो पहले सिर्फ 16 प्रतिशत था।
जल संसाधन विभाग के अनुसार, इंद्रावती-जोरानाला के संगम क्षेत्र में उड़ीसा सरकार द्वारा साढ़े तीन करोड़ रुपये की लागत से सिल्ट, पत्थर, मिट्टी आदि को हटाने की स्थायी योजना बनाई गई है। इसके बाद 50:50 जल बंटवारे का लक्ष्य भी जल्द हासिल हो सकता है।
हाइड्रोलिक कंट्रोल स्ट्रक्चर से बदली तस्वीर
मार्च के अंत तक इंद्रावती नदी में प्रवाह 2 क्यूमेक तक गिर गया था, लेकिन 11 अप्रैल को किए गए मापन में यह बढ़कर 11 क्यूमेक हो गया है। अब छत्तीसगढ़ की ओर 5.4 क्यूमेक जल प्रवाहित हो रहा है, जिससे न सिर्फ पेयजल संकट टल रहा है, बल्कि किसानों को सिंचाई के लिए भी राहत मिलने लगी है।
राजस्थान में उठाया गया था मुद्दा
जल संसाधन मंत्री केदार कश्यप ने राष्ट्रीय जल परिषद की बैठक में केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल की उपस्थिति में इस मुद्दे को जोरदार ढंग से रखा था। उड़ीसा के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी से मुख्यमंत्री साय की मुलाकात के बाद तत्काल कार्यवाही शुरू हुई।
स्थायी समाधान की दिशा में कदम
इंद्रावती-जोरानाला संगम पर पक्का स्ट्रक्चर निर्माण की सहमति बन चुकी है, जिससे जल बंटवारा वैज्ञानिक और संतुलित तरीके से होगा। यह निर्णय दोनों राज्यों के अभियंताओं की संयुक्त बैठक में लिया गया।
इंद्रावती का महत्व और प्रवाह
उड़ीसा के कालाहांडी जिले से निकलने वाली इंद्रावती नदी कुल 534 किमी की यात्रा में छत्तीसगढ़ में 232 किमी बहती है। यह नदी बस्तर की प्रमुख जलधारा है और इसकी भरपूर उपलब्धता कृषि, पेयजल और जैविक संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष:
ओडिशा-छत्तीसगढ़ के बीच हुए इस जल समझौते ने बस्तर के भविष्य को नया जल जीवन दिया है। अगर तय समयसीमा में सभी कार्य पूर्ण होते हैं, तो आने वाले वर्षों में इंद्रावती बस्तर की जनता के लिए फिर से समृद्धि की धारा बन सकती है।