गौरैया दिवस: हमारी नन्ही दोस्त की वापसी का इंतजार कब खत्म होगा?

– ओम साहू

कभी घरों की मुंडेरों, खेतों की मेंड़ों और आंगनों में चहचहाने वाली गौरैया (स्पैरो) आज हमारी आँखों से ओझल हो गई है। 20 मार्च को गौरैया दिवस मनाकर हम उसकी यादें तो ताजा कर लेते हैं, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि आखिर वो हमसे इतनी दूर क्यों चली गई?

गौरैया का दर्द, हमारी बेरुखी

गौरैया सिर्फ एक चिड़िया नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और लोकजीवन का हिस्सा रही है। गाँवों में इसे शुभ माना जाता था, बच्चे इसकी चहचहाहट पर खेलते थे और बुजुर्ग इसकी मासूमियत पर प्यार लुटाते थे। लेकिन शहरीकरण, मोबाइल टावरों से निकलने वाली रेडिएशन, कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल और कंक्रीट के जंगलों ने इसकी जिंदगी छीन ली।

क्या अब भी उम्मीद बाकी है?

जी हाँ! अगर हम चाहें तो गौरैया को फिर से अपने आंगन में बुला सकते हैं। अपने घरों के आसपास घोंसले लगाने के लिए जगह दें, बालकनी में कटोरी में पानी रखें और दाने डालें। जैविक खेती को बढ़ावा दें और पेड़ों को बचाने का संकल्प लें।

सिर्फ एक दिन नहीं, हर दिन हो गौरैया का दिवस

गौरैया दिवस हमें सिर्फ याद दिलाने का काम करता है कि हमसे कोई अपना बिछड़ रहा है। यह सिर्फ पर्यावरण संरक्षण का सवाल नहीं, बल्कि हमारी जड़ों और हमारे बचपन की मिठास को बचाने का प्रयास भी है। क्या हम अपनी नन्ही दोस्त को वापस लाने के लिए तैयार हैं?

(आपकी राय हमें जरूर बताएं! “छत्तीसगढ़ के पहट न्यूज” के साथ पर्यावरण संरक्षण की मुहिम में जुड़ें।)

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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