रिपोर्ट – जय शंकर पांडे

4 जुलाई 2026, रायपुर/ छत्तीसगढ़ शासन ने सामान्य प्रशासन विभाग की विभिन्न क्रमोन्नति वेतनमान योजनाओं को समाप्त कर उन्हें वित्त विभाग की समयमान वेतनमान व्यवस्था में समाहित करने का निर्णय लिया है। इसके तहत 31 मार्च 2026 तक नियुक्त कर्मचारियों को क्रमोन्नति अथवा समयमान वेतनमान में से किसी एक योजना का अंतिम विकल्प चुनना होगा, जबकि 1 अप्रैल 2026 अथवा उसके बाद नियुक्त कर्मचारियों को केवल समयमान वेतनमान का लाभ मिलेगा।
शासन का उद्देश्य अलग-अलग वेतनमान व्यवस्थाओं को एक व्यवस्था में लाना है, लेकिन इस निर्णय के बाद सहायक शिक्षक संवर्ग को लेकर कई तकनीकी सवाल खड़े हो गए हैं। आपत्ति यह है कि जिन कर्मचारियों से अंतिम विकल्प मांगा जा रहा है, उनके लिए दोनों विकल्प समान रूप से उपलब्ध ही नहीं हैं।
जानकारों का कहना है कि मध्यप्रदेश शासन ने 19 अप्रैल 1999 से शासकीय सेवा में प्रथम नियमित नियुक्ति के बाद एक ही वेतनमान में 12 एवं 24 वर्ष की सेवा पूर्ण करने पर क्रमोन्नति वेतनमान की व्यवस्था लागू की थी।
राज्य गठन के बाद सामान्य प्रशासन विभाग के 24 अप्रैल 2006 के आदेश से शिक्षक संवर्ग के लिए भी क्रमोन्नति वेतनमान स्वीकृत किया गया। इसके अनुसार सहायक शिक्षक के वेतनमान 4000-6000 (ग्रेड पे 2400) पर 12 एवं 24 वर्ष की सेवा पूर्ण होने पर क्रमशः 5000-8000 (ग्रेड पे 4200) तथा 5500-9000 (ग्रेड पे 4300) का क्रमोन्नत वेतनमान स्वीकृत हुआ। इसी प्रकार शिक्षक, व्याख्याता एवं प्राचार्य संवर्ग के लिए भी क्रमोन्नति वेतनमान निर्धारित किए गए। बाद में सामान्य प्रशासन विभाग के 10 मार्च 2017 के आदेश से प्रथम एवं द्वितीय क्रमोन्नति के लिए 10 एवं 20 वर्ष की सेवा अवधि निर्धारित कर दी गई।
दूसरी ओर, वित्त विभाग ने 28 अप्रैल 2008 (वित्त निर्देश 11/2008) के माध्यम से 1 अप्रैल 2006 से समयमान वेतनमान योजना लागू की। इसके परिशिष्ट-1 में प्रारंभिक वेतनमान 4000-6000 (5200-20200+2400) के लिए प्रथम उच्चतर वेतनमान 4500-7000 (5200-20200+2800) तथा द्वितीय उच्चतर वेतनमान 5000-8000 (9300-34800+4200) निर्धारित किया गया।
असल में देखा जाए तो यहीं से पूरा विवाद शुरू होता है। सहायक शिक्षक यदि क्रमोन्नति योजना का विकल्प चुनता है तो उसे अन्य शासकीय कर्मचारियों की तरह तृतीय उच्चतर वेतनमान का लाभ नहीं मिलेगा। दूसरी ओर यदि समयमान वेतनमान का विकल्प चुनता है तो यह भी व्यवहारिक नहीं है, क्योंकि सहायक शिक्षक संवर्ग के लिए त्रिस्तरीय समयमान वेतनमान आज तक स्वीकृत ही नहीं हुआ है। जबकि उच्च वर्ग शिक्षक, व्याख्याता और प्राचार्य संवर्ग को समयमान वेतनमान का लाभ पहले से स्वीकृत है।
समयमान वेतनमान में सेवा अवधि की गणना सेवा में प्रवेश की तिथि से की जाती है। ऐसे में सवाल यह है कि जिस व्यवस्था का लाभ अभी पूरी तरह उपलब्ध ही नहीं है, उसका अंतिम विकल्प कर्मचारी कैसे चुनें?
इसी मांग के साथ शासन से कहा गया है कि पहले सहायक शिक्षक संवर्ग के लिए त्रिस्तरीय समयमान वेतनमान स्वीकृत किया जाए, उसके बाद ही अंतिम विकल्प लेने की समय-सीमा तय की जाए।
पूरा विवाद एक सवाल पर आकर अटक जाता है। सरकार ने कर्मचारियों को दो विकल्प तो दे दिए, लेकिन यदि एक विकल्प पूरा नहीं हो और दूसरे में पूरा लाभ न मिले, तो उसे वास्तविक विकल्प कैसे माना जाए? इसे ऐसे समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति के सामने दो दरवाजे हों, लेकिन एक दरवाजा खुलता ही न हो और दूसरा आधा खुला हो। कागज पर रास्ते दो दिखाई देंगे, लेकिन मंजिल तक पहुंचने का भरोसा किसी से नहीं होगा। अब देखना यह है कि शासन पहले इस तकनीकी कमी को दूर करता है या फिर इसी व्यवस्था के बीच कर्मचारियों से अंतिम विकल्प लेने की प्रक्रिया पूरी करता है।