रिपोर्ट – जय शंकर पांडे

जगदलपुर, 21 जुलाई 2026/ छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में पारंपरिक आजीविका से हटकर कुछ नया करने का जज्बा अब ग्रामीण युवाओं की तकदीर बदल रहा है। जिले के विकासखंड बकावंड के किंजोली गाँव की रहने वाली ग्रेसी दुग्गा ने पशु चिकित्सा विभाग के सहयोग से क्षेत्र में आधुनिक सूकरपालन की एक शानदार मिसाल पेश की है, जो आज पूरे बस्तर के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है।
आमतौर पर आज के युवा जहाँ नौकरियों के पीछे आकर्षित होते हैं, वहीं ग्रेसी दुग्गा ने लीक से हटकर स्वरोजगार की राह चुनी। ग्रेसी ने साल 2023 में उत्तराखंड के देहरादून से बीएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई पूरी की है।

   ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने आगे मास्टर्स या पीएचडी की थ्योरिटिकल पढ़ाई करने के बजाय प्रैक्टिकल नॉलेज को तवज्जो दी और सीधे फार्मिंग सेक्टर में कदम रखने का फैसला किया। ग्रेसी ने मन बनाया था कि उन्हें हॉर्टिकल्चर, सब्जी या फूलों की खेती में नहीं जाना है। बकरीपालन, कुक्कुटपालन और मछलीपालन जैसे व्यवसायों में प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा था। इसके विपरीत जनजातीय समुदाय से आने के कारण उन्होंने देखा कि स्थानीय स्तर पर सूकर की खपत बहुत अच्छा है, लेकिन लोग इसे केवल घरेलू स्तर पर ही पालते थे, कमर्शियल स्तर पर नहीं। इसी अंतर को भांपते हुए उन्होंने इसे बड़े स्तर पर व्यावसायिक रूप देने की ठानी।
बस्तर क्षेत्र में सूकरपालन की इस बढ़ती मांग को देखते हुए ग्रेसी को बड़े स्तर पर आधुनिक तकनीक के साथ व्यवसाय शुरू करने के लिए तकनीकी मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता की आवश्यकता थी, जिसे पशु चिकित्सा सेवायें के संयुक्त संचालक कार्यालय ने बखूबी पूरा किया।

विभाग के मार्गदर्शन में ग्रेसी ने एक व्यापक और आधुनिक सूकरपालन परियोजना तैयार की, जिसकी कुल लागत एक करोड़ 12 लाख 10 हजार रुपए (एक करोड़ बारह लाख दस हजार रुपये) थी। इस बड़े प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने के लिए उन्होंने केंद्र सरकार की नेशनल लाइव स्टॉक मिशन योजना के अंतर्गत आवेदन किया। योजना के तहत उनके एग्रीकल्चर सर्टिफिकेट और विभिन्न ट्रेनिंग सर्टिफिकेट्स के आधार पर सेंट्रल लेवल कमेटी ने उनके प्रोजेक्ट को मंजूरी दी। अनुसूचित जनजाति वर्ग से इस योजना में पहली बार आवेदन करने के कारण उन्हें विभाग द्वारा संचालित इस योजना के अंतर्गत तीस लाख रुपये की सब्सिडी प्राप्त हुई। ग्रेसी के मुताबिक यदि उन्हें यह सरकारी अनुदान न मिलता तो वह निजी स्तर पर महज 20 से 25 सूकरों के साथ बहुत छोटे पैमाने पर शुरुआत कर पातीं, लेकिन इस सब्सिडी ने उनके हौसलों को उड़ान दी और उन्होंने आधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ अपने बड़े फार्म की शुरुआत की।



       पशुपालन विभाग के चिकित्सकों और कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में फार्म में उन्नत नस्ल के सूकर लाए गए और उनके उचित टीकाकरण व खान-पान का विशेष ध्यान रखा गया। ग्रेसी इन उन्नत नस्ल के सूकरों को विशेष तौर पर तमिलनाडु से लेकर आईं। फार्म की शुरुआत मई 2025 में कुल 110 प्रजनन योग्य सूकरों के साथ हुई थी, जिसमें 100 मादा और 10 नर सूकर शामिल थे। चूंकि वे शुरुआत में छोटे बच्चे लेकर आए थे, इसलिए उन्हें बड़ा करने और फिर ब्रीडिंग कराने में करीब एक साल का समय लग गया। इस दौरान कुछ जानवरों की मृत्यु भी हुई, लेकिन आधुनिक प्रबंधन का परिणाम यह रहा कि जून 2026 तक फार्म में 202 वयस्क प्रजनन सूकर साथ-साथ करीब 206 पिगलेट्स (बच्चे) तैयार हो गए हैं और वर्तमान में फार्म में कुल 400 से ज्यादा सूकर मौजूद हैं, जो इस व्यवसाय की  अच्छी शुरुआत के साथ उल्लेखनीय प्रगति को रेखांकित करती है।

         इस बेहतरीन शुरुआत के साथ ही ग्रेसी दुग्गा के फार्म से उन्नत नस्ल के पिगलेट्स की व्यावसायिक बिक्री भी अब शुरू हो चुकी है। इनके फार्म से रायपुर और स्थानीय (लोकल) बाजारों में सूकर सप्लाई की जा रही है। हाल ही में उन्होंने अपने फार्म से कुल 65 सूकर को 6 हजार रुपए प्रति पिगलेट की दर से बेचकर 3 लाख 90 हजार रुपये की शानदार आय प्राप्त की है। पशु चिकित्सा विभाग के निरंतर सहयोग, समय पर मिले शासन का अनुदान और ग्रेसी दुग्गा की कड़ी मेहनत व शैक्षणिक सूझबूझ ने इस फार्म को पूरे क्षेत्र के लिए एक मिसाल बना दिया है। आज ग्रेसी न केवल खुद आत्मनिर्भर बनी हैं बल्कि बस्तर के अन्य पढ़े-लिखे युवाओं को भी कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में नए स्टार्टअप शुरू करने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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