रिपोर्ट – जय शंकर पांडे

जगदलपुर, 31 जुलाई 2026/ जब उम्मीद का आखिरी चिराग टिमटिमाने लगे, तब इंसान का जज्बा ही उसे तूफानों से बाहर निकालता है। पिता स्वर्गीय फूलचंद बघेल का साया सिर से उठ जाने के बाद शीतल का परिवार गहरे आर्थिक संकट में घिर गया था। शीतल को 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद घर की तंगहाली, बेरोजगारी और भविष्य की चिंता उनके हर दिन को एक नई चुनौती बना रही थी। इसी घने अंधेरे के बीच उनके एक शिक्षक देवदूत बनकर सामने आए, जिन्होंने उनकी मायूसी को समझा और उन्हें जिला प्रशासन की अनूठी पहल जिला परियोजना आजीविका कॉलेज की राह दिखाई।
आजीविका कॉलेज आड़ावाल की दहलीज पर कदम रखते ही काउंसलिंग के दौरान शीतल की जिंदगी को एक नया मोड़ मिला। औजारों और बिजली के काम में उनकी रुचि को देखते हुए उन्हें असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन पाठ्यक्रम के लिए चुना गया। इसके बाद शुरू हुआ मेहनत और संघर्ष का असली अध्याय, जहाँ किताबों के साथ-साथ उनके हाथों ने पेचकस, प्लास और बिजली के तार थाम लिए। समाज की रूढ़िवादिता और राह की तमाम मुश्किलों को दरकिनार करते हुए शीतल ने हुनरमंद बनने के लिए दिन-रात एक कर दिया। धीरे-धीरे तारों का उलझा जाल उनके बढ़ते आत्मविश्वास का आधार बन गया और उन्होंने राज्य की कौशल परीक्षा में सफलता का परचम लहराया।
शीतल की इस कड़ी मेहनत का फल उन्हें जगदलपुर के मगध इलेक्ट्रिकल में असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन की नौकरी के रूप में मिला। आज जब उनके हाथों से बिजली का कनेक्शन जुड़ने पर बल्ब की रोशनी से कमरा जगमगाता है, तो वह केवल रोशनी नहीं, बल्कि उनके खुद के जीवन का उजाला होता है। हर महीने करीब नौ हजार रुपए कमाकर उन्होंने न केवल अपने परिवार की माली हालत को संभाला है, बल्कि अपनी आगे की पढ़ाई का खर्च भी खुद उठाकर यह साबित किया है कि बेटियां किसी पर बोझ नहीं होतीं।
अपनी इस अविश्वसनीय यात्रा पर अब शीतल गर्व से कहती हैं कि आजीविका कॉलेज के प्रशिक्षण ने उनके भीतर सोए आत्मविश्वास को जगाया है और आज वह रोजगार पाकर खुद अपनी पढ़ाई पूरी कर रही हैं। साथ ही इस नई जिंदगी के लिए वे जिला प्रशासन और मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के प्रति अपना आभार व्यक्त करती हैं। शीतल की यह प्रेरक दास्तान आज हर उस युवा के लिए एक जलती हुई मशाल है, जो मुश्किलों से हार मानने के बजाय अपने हुनर के दम पर अपनी किस्मत खुद लिखना चाहते हैं।