1 जून 2025
✍️ रिपोर्ट: ओम साहू
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छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले स्थित गुरुघासीदास टाइगर रिजर्व में दो नन्हे बाघ शावकों का जन्म हुआ है, जिसे वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। लेकिन इस खुशखबरी के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है — क्या यह वन्यजीवों की वापसी जंगलों को कॉरपोरेट माफिया से बचा पाएगी?
जंगल में उम्मीद की दस्तक
गुरुघासीदास टाइगर रिजर्व को साल 2021 में छत्तीसगढ़ का चौथा टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। यहां लंबे समय से बाघों की मौजूदगी की उम्मीद थी, लेकिन शावकों का जन्म होना एक स्पष्ट संकेत है कि अब यह इलाका सक्रिय रूप से बाघों का निवास बन चुका है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, ये शावक करीब एक महीने के हैं और पूरी तरह स्वस्थ हैं। रिजर्व क्षेत्र में कैमरा ट्रैप के ज़रिए इनकी तस्वीरें सामने आईं हैं, जिससे वन विभाग और पर्यावरण प्रेमियों में उत्साह है।
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⛏️ जंगल के नीचे छुपा है कोयला — खतरे में है पारिस्थितिकी
गुरुघासीदास और हसदेव अरण्य क्षेत्र न सिर्फ वन्यजीवों का घर है, बल्कि यहां कोयला और अन्य खनिजों का बड़ा भंडार भी मौजूद है। यही कारण है कि कॉर्पोरेट कंपनियों की नज़रें सालों से इन जंगलों पर टिकी हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में खनन की अनुमति दी गई, तो यह न सिर्फ इन नवजात बाघ शावकों के लिए खतरा बनेगा, बल्कि पूरे जैवविविधता क्षेत्र का संतुलन बिगड़ जाएगा।
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क्या बाघों की मौजूदगी रोक पाएगी खनन?
भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में खनन जैसी गतिविधियाँ निषिद्ध हैं। लेकिन अतीत में कई बार देखा गया है कि “पर्यावरणीय क्लीयरेंस” के नाम पर नीतियों को दरकिनार कर दिया गया है। महाराष्ट्र की अवनी बाघिन की हत्या और उसके क्षेत्र में खनन की मंज़ूरी इस बात का उदाहरण है।
अब सवाल ये उठता है — क्या गुरुघासीदास में बाघों की वापसी खनन के माफिया तंत्र को चुनौती दे पाएगी? या फिर वही सत्ता-कारोबार गठजोड़ एक बार फिर जंगलों को चीर देगा?
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सरकार की परीक्षा की घड़ी
राज्य और केंद्र सरकार के लिए यह समय नीति बनाम नीयत की असली परीक्षा है। यदि सरकारें वास्तव में वन्यजीव संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर गंभीर हैं, तो गुरुघासीदास और हसदेव क्षेत्र को पूरी तरह से संरक्षित क्षेत्र घोषित कर, खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए।
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जनता और मीडिया की भूमिका
इस मुद्दे पर देशभर के नागरिकों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र मीडिया को जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है। बाघों की मौजूदगी केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है, यह एक चेतावनी और अवसर दोनों है — जंगल बचाने का, भविष्य बचाने का।
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यह समाचार CG Pahat News द्वारा जनहित में प्रकाशित किया गया है।
✍️ रिपोर्ट: ओम साहू, प्रबंध संपादक, छत्तीसगढ़ पहट न्यूज