Report Om sahu

✍ लेखक: डॉ. रुपेंद्र कवि
मानव वैज्ञानिक एवं जनजातीय संस्कृति विशेषज्ञ

 प्रस्तावना

हर साल आषाढ़ पूर्णिमा को श्रद्धा और स्मृति का पर्व गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है। यह दिन ऋषि वेदव्यास के जन्मोत्सव के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने वेदों का संकलन कर ज्ञान की धारा को व्यवस्थित किया।
भारत में जहाँ गुरु को ज्ञान, मोक्ष और मार्गदर्शन का प्रतीक माना गया, वहीं बस्तर जैसे आदिवासी अंचलों में ‘गुरु’ की परिभाषा और स्वरूप अलग ही रंग में ढले हैं।

 देवगुड़ी: परंपरा स्वयं गुरु बन जाती है

बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा और नारायणपुर जैसे आदिवासी इलाकों में गाँव की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र देवगुड़ी होती है।
यह कोई मंदिर नहीं, बल्कि सामुदायिक स्मृति का स्थल है, जहाँ प्रकृति, पूर्वज और लोकदेवता पूजे जाते हैं।
यहाँ पुजारी, गुनिया या बैगा न सिर्फ पूजा करता है, बल्कि गुरु के रूप में पूरे समाज का मार्गदर्शन करता है — नैतिकता, कृषि, संकट निवारण और सामाजिक संतुलन तक।

यहाँ ‘गुरु पूर्णिमा’ किसी एक व्यक्ति के सम्मान की नहीं, बल्कि संपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति है।

吝 अनुभव आधारित गुरु: पढ़ाया नहीं, सिखाया जाता है

यहाँ गुरु वह नहीं जो सिर्फ मंच से बोले — बल्कि वह होता है जो जीवन जीने की कला जी कर सिखाए:

जंगल से संवाद कैसे करें

जड़ी-बूटियों से इलाज कैसे करें

ऋतुओं को कैसे पढ़ें

गोत्र और मर्यादा कैसे निभाएँ

यहाँ शिक्षा अनुभव से दी जाती है — वाणी से नहीं, व्यवहार से।

 बदलती पीढ़ी, बदलती परंपरा

आज जब आदिवासी समाज शिक्षा और इंटरनेट से जुड़ रहा है, तो गुरु पूर्णिमा का स्वरूप भी बदल रहा है।
विद्यालयों में अब छात्र अपने शिक्षकों को सम्मान देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे शहरी इलाकों में होता है।
मगर इसके साथ-साथ गाँवों में आज भी देवगुड़ी पर दीप जलते हैं, सामूहिक पूजा होती है, और बुजुर्गों को प्रणाम कर जीवन की शिक्षा ली जाती है।

 टकराव नहीं, तालमेल

बस्तर का आदिवासी समाज बाहरी प्रभावों को नकारता नहीं, बल्कि उन्हें अपनी परंपरा में पिरो लेता है।
गुरु पूर्णिमा भी इसी समायोजन का उदाहरण है — जहाँ शास्त्रीय भारत की परंपरा और स्थानीय संस्कृति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

✨ निष्कर्ष

गुरु पूर्णिमा आदिवासी समाज में केवल गुरु की पूजा नहीं, बल्कि पूर्वजों, परंपरा, प्रकृति और सामूहिक चेतना के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।
यह सिखाता है कि गुरु कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है, जो हमें गढ़ती है।

 देवगुड़ी से विद्यालय तक — गुरु अब भी हैं, बस उनके रूप बदल गए हैं।

✍ लेखक परिचय

डॉ. रुपेंद्र कवि पिछले दो दशकों से बस्तर व भारत की जनजातीय संस्कृतियों पर अध्ययन कर रहे हैं। जनजातीय अनुभव, परंपरागत ज्ञान और सांस्कृतिक संरक्षण पर आपके लेख राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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