रायपुर/बस्तर: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सवाल उठाया कि जब कुछ राज्यों की प्रति व्यक्ति आय अधिक है, तो वहां की बड़ी आबादी अभी भी गरीबी रेखा के नीचे क्यों है? इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ की स्थिति पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है, जहां सरकार एक ओर मुफ्त राशन देकर गरीबों की मदद करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर नई शराब दुकानों की संख्या बढ़ाकर और खनिज संसाधनों की लूट को नजरअंदाज कर मूल निवासियों को आर्थिक रूप से कमजोर बना रही है।

बस्तर में गरीबी उन्मूलन की दिशा में प्रगति, लेकिन चुनौतियां बरकरार

बस्तर जिले में सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, गरीबी उन्मूलन (SDG 1) में सुधार देखा गया है, लेकिन अब भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं।

  • 2015 में बस्तर का गरीबी सूचकांक स्कोर 18 था, जो 2023 में बढ़कर 34 हो गया। यह सुधार की ओर संकेत करता है, लेकिन बस्तर अभी भी “अस्पिरेंट” (Aspirant) श्रेणी में है, यानी गरीबी उन्मूलन के लिए और अधिक प्रयासों की जरूरत है।
  • जिला मल्टी-डायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स (MPI) स्कोर 2015 में 0.226 था, जो 2023 में घटकर 0.16 हो गया, जिससे गरीबी में कमी के संकेत मिलते हैं।
  • मनरेगा (MGNREGA) के तहत रोजगार: 2015 में 58.42% लोगों को रोजगार मिला था, जबकि 2023 में यह आंकड़ा बढ़कर 99.99% हो गया, जो एक बड़ी उपलब्धि है।
  • कच्चे मकानों में रहने वाले ग्रामीण परिवारों की संख्या: 2015 में 94.43% थी, जो 2023 में घटकर 44.15% रह गई, जिससे आवास सुविधाओं में सुधार हुआ है।
  • सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ: 2015 में 5.47% लोग इनसे जुड़े थे, जो 2023 में बढ़कर 6.76% हो गए।

शराब नीति पर उठते सवाल

राज्य सरकार द्वारा हाल ही में नई शराब दुकानों को खोलने का फैसला किया गया, लेकिन बस्तर जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में शराब ओवररेट कीमतों पर बेची जा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार गरीबों को मुफ्त राशन देकर शराब की खपत बढ़ा रही है, जिससे गरीब तबका और अधिक कर्ज व नशे की लत में फंस रहा है।

बस्तर के सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं, “सरकार एक तरफ मुफ्त राशन देकर गरीबों का भला करने की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ शराब की दुकानें बढ़ाकर और ओवररेट शराब बेचकर उन्हीं गरीबों से पैसा वसूल रही है।”

खनिज संपदा पर बाहरी लोगों का कब्जा

छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है, लेकिन खनन और खदानों से होने वाली आमदनी का बड़ा हिस्सा बाहरी कंपनियों और उद्योगपतियों के हाथों में चला जाता है। स्थानीय आदिवासी समुदायों को इन संसाधनों से सीधा लाभ नहीं मिलता, बल्कि वे विस्थापन, बेरोजगारी और प्रदूषण जैसी समस्याओं से जूझते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि “खनिज संसाधनों का लाभ अगर स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंचता तो यह सरकार की विफलता को दर्शाता है।”

अब भी बनी हुई चुनौतियां

  • स्वास्थ्य बीमा कवरेज में गिरावट: 2015 में 71.2% परिवार किसी न किसी स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत आते थे, लेकिन 2023 में यह घटकर 69.3% रह गया, जो चिंता का विषय है।
  • महिलाओं और बच्चों में कुपोषण: 5 साल से कम उम्र के बच्चों में अंडरवेट की दर 50.6% से घटकर 23.3% हो गई, लेकिन गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की दर 57.3% से बढ़कर 79% हो गई।
  • रोजगार के अवसर: श्रम शक्ति भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate) में सुधार हुआ है, लेकिन महिला श्रमिकों की भागीदारी अभी भी कम है।

सरकार और समाज को उठाने होंगे ठोस कदम

हालांकि गरीबी कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं, लेकिन अभी भी बस्तर को “परफॉर्मर” (Performer) या “फ्रंट रनर” (Front Runner) श्रेणी में लाने के लिए और अधिक योजनाओं की आवश्यकता है।

सरकार को चाहिए कि:

  1. शराब नीति की समीक्षा कर इसकी उपलब्धता सीमित करे।
  2. खनिज संसाधनों से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा स्थानीय लोगों के विकास में लगाए।
  3. सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करे।
  4. शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थायी रोजगार पर अधिक ध्यान दे।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का सवाल एक चेतावनी है कि अगर सरकारी नीतियां सुधारी नहीं गईं, तो गरीब और गरीब होते जाएंगे और राज्य की संपदा का लाभ बाहरी लोग ही उठाते रहेंगे।

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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