रिपोर्ट –जय शंकर पांडे

सीख के साथ रचनात्मकता की उड़ान


जगदलपुर, 16 मई 2026/ बच्चों की कल्पनाशक्ति और सीखने की क्षमता को अगर सही दिशा मिले, तो खेल-खेल में भी मुश्किल चीजें बेहद आसान हो जाती हैं। कुछ ऐसा ही अनोखा और प्रेरणादायक नजारा बस्तर जिले के 126 आंगनबाड़ी केंद्रों में देखने को मिला, जहां ‘तितली संस्था’ के सहयोग से एक विशेष गतिविधि सत्र का आयोजन किया गया। इस अनूठे सत्र में बच्चों ने न सिर्फ गणित के बुनियादी गुर सीखे, बल्कि वर्तमान मौसम के मिजाज को समझते हुए चिलचिलाती गर्मी से खुद को सुरक्षित रखने के व्यावहारिक तरीके भी जाने।
जिले के इन सभी आंगनबाड़ी केंद्रों में आयोजित इस गतिविधि की सबसे खास बात यह रही कि इसमें पारंपरिक ब्लैकबोर्ड और चॉक की पढ़ाई से इतर, बच्चों को सीधे प्रकृति से जोड़ा गया। बच्चों ने अपने आसपास बिखरी प्राकृतिक सामग्रियों जैसे पेड़ के पत्तों, छोटे-छोटे कंकड़ों और बालू का उपयोग कर एक मजेदार खेल की शुरुआत की। इन सामग्रियों को छूकर, इकट्ठा करके और आपस में गिनकर बच्चों ने संख्याओं की बुनियादी समझ विकसित की, जिससे उनकी गणितीय और गणना क्षमता को एक बेहद मजबूत आधार मिला। कंकड़-पत्थरों और पत्तों की मदद से जोड़ना और घटाना बच्चों के लिए एक बोझिल विषय होने के बजाय उनके दैनिक जीवन का एक मनोरंजक हिस्सा बन गया।


संख्याओं के इस सफर के बाद सत्र के अगले हिस्से में बच्चों को गर्मी के मौसम के बारे में जागरूक किया गया। इस अनौपचारिक और सहज बातचीत के दौरान बच्चों ने बड़े ही सरल अंदाज में समझा कि कड़ाके की धूप का हमारे शरीर पर क्या असर होता है और इस मौसम में खुद को सुरक्षित तथा ठंडा रखने के लिए कौन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए, जैसे कि सही मात्रा में पानी पीना और सूती कपड़ों का चयन करना। सीख के इस सिलसिले को और मजेदार बनाते हुए बच्चों ने अपनी रचनात्मकता और क्राफ्ट कला का भी बेहतरीन प्रदर्शन किया। उन्होंने रंग-बिरंगे कागज (पेपर) की मदद से बेहद सुंदर और आकर्षक हाथ के पंखे बनाए, जिसे देखकर उनके चेहरों पर एक अलग ही चमक और खुशी साफ नजर आ रही थी।
शिक्षा और बाल विकास विशेषज्ञों का भी मानना है कि बस्तर जैसे क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर की जा रही ऐसी व्यावहारिक और मनोरंजक गतिविधियाँ बच्चों के भीतर न केवल सीखने की ललक पैदा करती हैं, बल्कि उनके सोचने के दायरे, कल्पनाशक्ति और आत्मविश्वास को भी कई गुना बढ़ा देती हैं। सीखने-सिखाने के इस रचनात्मक सफर में बच्चों की खिलखिलाहट और उनका उत्साह यह साफ बयां कर रहा था कि जब पढ़ाई में खेल, सुरक्षा और कला का अद्भुत तालमेल बैठता है, तो बचपन सचमुच अपने पूरे रंग में खिल उठता है।

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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