रिपोर्ट – जय शंकर पांडे

19 अगस्त 2026, जगदलपुर। बस्तर की धरती प्राचीन काल से ही शैव साधना और शिव उपासना की महत्वपूर्ण भूमि रही है। सातवीं-आठवीं सदी में बस्तर क्षेत्र में नल राजवंश के शासकों का शासन था। उस कालखंड में बस्तर क्षेत्र भारत में शैव साधना के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित था। छठवीं-सातवीं सदी के कालखंड में बस्तर के अनेक प्रमुख नगरों में शिव मंदिरों का निर्माण हुआ, जिनमें गोबरहीन, केशकाल, गढ़ धनोरा,दंतेवाड़ा, रामपाल और देवड़ा आदि प्रमुख हैं। नलकालीन ये शिवालय आज भी श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र बने हुए हैं। इन्हीं प्राचीन शिवालयों में देवड़ा का झाड़ेश्वर महादेव मंदिर भी महत्वपूर्ण है। यहां स्थित शिवलिंग छठवीं सातवीं सदी का माना जाता है। देवड़ा,जगदलपुर के समीप तिरिया माचकोट के जंगल क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन शिवधाम है।



इतिहास के सहायक प्राध्यापक ओम प्रकाश सोनी ने बताया कि देवड़ा का यह शिवालय मध्यकाल में,अर्थात सोलहवीं सदी में भी पूजित था। चक्रकोट (बस्तर) के राजा राणक जयसिंह देव काकतीय ने देवड़ा के दानेश्वर महादेव मंदिर को जम्बू गांव अर्पित किया था। इस संबंध में प्राप्त अभिलेख केसरपाल ग्राम से मिला था। उस कालखंड के अभिलेख में देवड़ा के शिवालय को ‘दानेश्वर शिवालय’ कहा गया है। कालांतर में यही नाम अपभ्रंश होकर ‘झाड़ेश्वर शिव’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। जम्बू ग्राम वर्तमान में जाम गांव के नाम से जाना जाता है। राजा जयसिंह देव काकतीय द्वारा जाम गांव से प्राप्त आय देवड़ा के दानेश्वर महादेव मंदिर को अर्पित की गई थी।



सोनी ने कहा कि इतिहास के अनुसार, जयसिंह देव काकतीय सोलहवीं सदी में पुरुषोत्तम देव के बाद चक्रकोट बस्तर के राजा हुए थे। यह तथ्य इस बात को भी रेखांकित करता है कि नलकाल में स्थापित शिवालय मध्यकाल तक भी निरंतर पूजित और धार्मिक आस्था के केंद्र बने रहे। यह भी अनुमान किया जाता है कि देवड़ा के शिवालय का नाम दानेश्वर शिव छठवीं सातवीं सदी से ही प्रचलित रहा हो। आज यही प्राचीन दानेश्वर महादेव झाड़ेश्वर महादेव के नाम से विख्यात शिवधाम है।

ओम प्रकाश सोनी ने आगे कहा कि देवड़ा के इतिहास को प्रमाणित करने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्यों में राजा जयसिंह देव काकतीय का अभिलेख भी शामिल है। बस्तर में काकतीय वंश का यह पहला और एकमात्र ज्ञात अभिलेख है। वर्तमान में यह अभिलेख जगदलपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। हालांकि अभिलेख में राजा के वंश का उल्लेख नहीं है, किंतु अभिलेख की भाषा शैली के आधार पर इसे सोलहवीं सदी के राजा जयसिंह देव से संबंधित माना गया है।

देवड़ा का झाड़ेश्वर महादेव मंदिर केवल श्रद्धा का केंद्र ही नहीं, बल्कि बस्तर की प्राचीन शैव परंपरा, नलकालीन स्थापत्य विरासत और मध्यकालीन ऐतिहासिक परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण है। दानेश्वर से झाड़ेश्वर तक की यह यात्रा बस्तर की उस गौरवशाली धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सामने लाती है, जिसे संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है।

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

Leave a Reply