रिपोर्ट – जय शंकर पांडे

बीजापुर 18 सितम्बर 2026/ ग्राम पंचायत पिटेपाल के चेर्ली गांव में रहने वाला मीटू हेमला आज अपने छोटे से पक्के घर में अपने बेटे को पढ़ते हुए देखता है। घर की दीवारों पर भले ही कोई बड़ी सजावट न हो, लेकिन इस घर के भीतर एक ऐसा सुकून है, जिसके लिए मीटू ने अपनी जिंदगी के कई साल गंवाए हैं। आज उसकी सबसे बड़ी खुशी उसका कक्षा 4 में पढ़ने वाला बेटा विवेक है। बेटा जब स्कूल की किताब लेकर घर में बैठता है, तो मीटू उसे चुपचाप देखता है। उसके मन में शायद यही भाव आता होगा “मेरे बेटे का जीवन मेरे जैसा नहीं होगा।” लेकिन इस शांत और सुकून भरी तस्वीर के पीछे मीटू के जीवन का एक ऐसा अतीत छिपा है, जिसे याद करना भी पीड़ादायक है।

15 साल तक जंगलों में बीता जीवन

कभी यही मीटू अबूझमाड़ के घने जंगलों में करीब 15 वर्षों तक नक्सली गतिविधियों से जुड़ा रहा। नक्सली संगठन में वह डिप्टी कमांडर के रूप में काम करता था। कंधे पर ए.के.-47 और सामने जंगलों की कठिन राहें उसके जीवन का हिस्सा बन चुकी थीं। जंगल की पगडंडियां ही उसका रास्ता थीं और संघर्ष ही उसकी दिनचर्या। इसी दौरान संगठन में उसकी मुलाकात मुन्नी हेमला से हुई। दोनों के बीच प्रेम हुआ और वर्ष 2013 में दोनों ने विवाह कर लिया। वर्ष 2017 में उनके घर बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने प्यार से विवेक रखा।


बच्चे के जन्म के बाद परिवार के भविष्य की चिंता भी बढ़ने लगी। एक ओर संगठन का जीवन था, दूसरी ओर छोटे बच्चे की जिम्मेदारी। इसी चिंता के बीच मीटू की पत्नी मुन्नी ने वर्ष 2018 में आत्मसमर्पण कर सामान्य जीवन की राह चुनी। वहीं मीटू का जीवन कुछ और वर्षों तक जंगल और नक्सली गतिविधियों के बीच चलता रहा।


जहां एक सामान्य पिता अपने बच्चों के साथ घर में बैठकर उनके भविष्य की बातें करता है, वहीं मीटू का जीवन जंगलों और संघर्ष के बीच गुजर रहा था। कितने त्योहार परिवार से दूर बीते, कितनी रातें जंगल में गुजरीं और कितने ऐसे पल आए जब अगली सुबह की कोई निश्चितता नहीं थी -इन सबकी गिनती शायद मीटू ने भी कभी नहीं की।

वर्ष 2022 में लिया नई जिंदगी का फैसला

लगभग 15 वर्षों तक नक्सली जीवन जीने के बाद वर्ष 2022 में मीटू ने आखिरकार आत्मसमर्पण करने का फैसला ले लिया। यह सिर्फ हथियार छोड़ने का निर्णय नहीं था, बल्कि उस जिंदगी से बाहर निकलने का साहस था, जिसने उसके जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों को अपने साथ बांध रखा था। उस दिन कंधे से बंदूक उतरी और उसके साथ जंगलों में बीते जीवन का एक अध्याय भी पीछे छूट गया। सामने थी एक नई जिंदगी -परिवार के साथ रहने की, सुरक्षित घर बनाने की और अपने बेटे को पढ़ाने की। हालांकि नई जिंदगी की शुरुआत आसान नहीं थी। वर्षों तक जंगल और संघर्ष के बीच रहने के बाद सामान्य जीवन की छोटी-छोटी जरूरतें भी बड़ी लगती थीं। मीटू का सबसे बड़ा सपना था कि उसके परिवार के पास एक ऐसा घर हो, जहां रात को सोते समय डर न हो और सुबह उसका बेटा किताब लेकर स्कूल जा सके।

पक्के घर ने दी नई जिंदगी को मजबूत नींव

आत्मसमर्पण के बाद मीटू को प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के अंतर्गत आवास का लाभ मिला। एक-एक ईंट जुड़ती गई और धीरे-धीरे उसके सपनों का पक्का घर तैयार हो गया। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन के 15 वर्ष जंगलों में बिताए थे, उसके लिए यह घर महज चार दीवारें नहीं था। यह उसके लिए सामान्य जीवन में लौटने की मजबूत नींव था। यह वह जगह थी, जहां वह अपने परिवार के साथ सुरक्षित जीवन जी सकता था और अपने बेटे के भविष्य के सपने देख सकता था।
जब घर बनकर तैयार हुआ होगा, तो शायद मीटू ने अपनी पुरानी जिंदगी को एक बार पीछे मुड़कर देखा होगा -एक तरफ घना जंगल था, दूसरी तरफ उसका अपना घर। एक तरफ कंधे पर बंदूक थी, दूसरी तरफ बेटे के हाथ में किताब। एक तरफ बीते हुए 15 साल थे और दूसरी तरफ बेटे के भविष्य के आने वाले कई साल।

अब बेटे की पढ़ाई ही सबसे बड़ा सपना

आज मीटू के जीवन में सबसे बड़ा बदलाव यही है कि उसके घर में अब डर की जगह उम्मीद है। उसका बेटा विवेक कक्षा 4 में पढ़ रहा है और मीटू चाहता है कि उसका बेटा खूब पढ़े-लिखे और अपने पैरों पर खड़ा हो। मीटू के लिए पक्का मकान सिर्फ सरकारी योजना से मिला आवास नहीं, बल्कि उसके नए जीवन का प्रतीक है। यह घर उसे बार-बार याद दिलाता है कि जिंदगी चाहे कितने भी कठिन मोड़ क्यों न दिखाए, सही दिशा में उठाया गया एक कदम भविष्य बदल सकता है।

कभी जिस हाथ में बंदूक थी, आज उसी हाथ में अपने बेटे की किताब और भविष्य को संवारने का सपना है। जंगल से घर तक और संघर्ष से सामान्य जीवन तक मीटू हेमला की यह यात्रा बदलाव, उम्मीद और नई शुरुआत की कहानी है।

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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