रिपोर्ट: ओम साहू
अबूझमाड़ के घने जंगलों में चार दिन पहले सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई भीषण मुठभेड़ में मारे गए 27 नक्सलियों में से पांच के शव अब भी परिजनों को नहीं सौंपे गए हैं। इसको लेकर नारायणपुर पुलिस मुख्यालय के बाहर परिजनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। उनका आरोप है कि पुलिस उन्हें शव नहीं दे रही और उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान कर रही है।
इन पांच नक्सलियों में एक मोस्ट वांटेड नक्सली कमांडर भी शामिल था, जिसकी तलाश सुरक्षाबलों को वर्षों से थी। सवाल उठता है कि जब यही नक्सली बस्तर की धरती को बारूद से दहला रहे थे, तब उनके परिजनों ने उनकी हरकतों पर चुप्पी क्यों साध रखी थी? तब उन्हें उनका भटका हुआ रास्ता क्यों नहीं दिखा?
आज जब ये नक्सली मारे गए हैं, तो परिजन रिश्तेदारी का हवाला देते हुए शवों की मांग कर रहे हैं। नारायणपुर एसपी कार्यालय से लेकर अस्पताल परिसर तक नारेबाजी की जा रही है और ‘इंसाफ’ की माँग की जा रही है।
यह मामला संवेदनशील अवश्य है, परंतु यह भी सोचने की आवश्यकता है कि जो लोग वर्षों तक मासूम आदिवासियों को बहका कर उन्हें बंदूक थमाते रहे, उन्हें आज ‘मृत्यु के बाद न्याय’ दिलाने की मांग क्या उनके कृत्यों को नजरअंदाज करना नहीं है?
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