“लिखते समय ही यह मेरे दिमाग में फिल्म की तरह चल रही थी” सौरभ शुक्ला
कभी-कभी किसी कहानी की मंज़िल कैमरा शुरू होने से पहले ही तय हो जाती है। “जब खुली किताब” की यात्रा…
कभी-कभी किसी कहानी की मंज़िल कैमरा शुरू होने से पहले ही तय हो जाती है। “जब खुली किताब” की यात्रा…