बस्तर में भाजपा के बागियों का परचम – सारिता पाणिग्रही और बनवासी मौर्य की जीत ने खड़े किए सवाल
रिपोर्ट ओम साहू
बकावंड | 24 फरवरी 2025
बस्तर जिला पंचायत चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अधिकृत प्रत्याशियों को हराकर बागी नेताओं सारिता पाणिग्रही और बनवासी मौर्य ने जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया कि ज़मीनी पकड़ और जनसमर्थन किसी भी राजनीतिक समीकरण से बड़ा होता है। उनकी इस शानदार जीत ने भाजपा के प्रत्याशी चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बगावत के बावजूद जनता ने चुना अपना नेता
बस्तर जिले के चुनाव में क्षेत्र क्रमांक 8 से सारिता जितेंद्र पाणिग्रही और क्षेत्र क्रमांक 9 से बनवासी मौर्य ने भाजपा समर्थित प्रत्याशियों को बड़े अंतर से हराया। ये दोनों नेता लंबे समय से भाजपा के सक्रिय सदस्य रहे हैं, लेकिन पार्टी संगठन में आंतरिक राजनीति के चलते उन्हें अधिकृत प्रत्याशी नहीं बनाया गया। इसके बावजूद जनता ने इनकी लोकप्रियता को देखते हुए बगावत के रास्ते पर चले इन नेताओं को भारी मतों से विजयी बनाया।
जनता के बीच मजबूत पकड़
सारिता पाणिग्रही और बनवासी मौर्य का जनसंपर्क, सेवा कार्य और बस्तर में गहरी जमीनी पकड़ इस जीत का सबसे बड़ा कारण रहा। उनके नेतृत्व में जनता ने उनपर भरोसा जताया और यह संदेश दिया कि चुनावी टिकट से ज्यादा महत्वपूर्ण नेता का कर्म और उसका समाज में योगदान होता है।
भाजपा की रणनीति पर उठे सवाल
भाजपा के अधिकृत प्रत्याशियों की हार ने संगठन के फैसलों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर भाजपा नेतृत्व ने सही तरीके से स्थानीय समीकरणों को समझा होता तो यह चुनावी परिदृश्य कुछ और ही होता। इस हार के बाद पार्टी नेतृत्व पर यह दबाव बढ़ सकता है कि वह अपने संगठनात्मक निर्णयों की समीक्षा करे और जमीनी नेताओं को उचित महत्व दे।
क्या भाजपा बागी नेताओं को फिर अपनाएगी?
चुनाव में शानदार जीत के बावजूद सारिता पाणिग्रही और बनवासी मौर्य ने भाजपा के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी है। अब यह भाजपा नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह इन प्रभावशाली नेताओं को दोबारा मुख्यधारा में शामिल करता है या नहीं। अगर पार्टी ने इन्हें नजरअंदाज किया, तो यह आने वाले चुनावों में बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत दे सकता है।
बस्तर की राजनीति में नए समीकरण
बस्तर का यह चुनाव यह दर्शाता है कि अब जनता केवल पार्टी सिंबल नहीं, बल्कि व्यक्तिगत नेतृत्व और कार्यशैली को देखकर अपना प्रतिनिधि चुन रही है। यह बदलाव केवल बस्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक दलों के लिए एक चेतावनी साबित हो सकता है कि अब केवल संगठन के फैसले नहीं, बल्कि जनता की पसंद ही असली ताकत होगी।
– छत्तीसगढ़के पहट न्यूज