मजदूरी छोड़ बनीं लखपति दीदी बनीं दशमी

रिपोर्ट –जय शंकर पांडे

जगदलपुर,07 मार्च 2026/    बस्तर के सुदूर अंचलों में महिला सशक्तिकरण की एक नई इबारत लिखी जा रही है, जिसका जीता-जागता उदाहरण ग्राम पंचायत मामड़पाल मुनगा की रहने वाली दशमी नाग हैं। कभी मजदूरी के भरोसे अपना जीवन बसर करने वाली दशमी आज ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी एक नई पहचान बना चुकी हैं। मोंगरा फूल महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद दशमी के जीवन में जो बदलाव आया, वह आज पूरे क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरक बन गया है। समूह से जुड़ने से पूर्व दशमी नाग की आर्थिक स्थिति अत्यंत सामान्य थी। वे खेती और पशुपालन तो करती थीं, लेकिन तकनीकी मार्गदर्शन और पूंजी के अभाव में उनकी आय कम ही हो पाती थी।

      

     धान, मक्का और सब्जी बाड़ी से होने वाली सीमित कमाई के साथ-साथ उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन महिला संगठन मुनगा और तीरथधारा महिला संगठन संकुल छिंदावाड़ा के साथ जुड़ने के बाद उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई।

         ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ने के बाद समूह के माध्यम से मिली कुल 41 हजार 500 रुपए की वित्तीय सहायता जिसमें डेढ़ हजार रूपए रिवॉल्विंग फंड, 15 हजार रूपए सीआईएफ और 25 हजार रूपए का बैंक लिंकेज शामिल था। यह सहायता दशमी के लिए एक मजबूत आधार साबित हुई।

              इस राशि का सही नियोजन करते हुए उन्होंने खेती और पशुपालन को वैज्ञानिक तरीके से विस्तार दिया। परिणाम यह हुआ कि जिस धान की खेती से वे पहले 50 हजार रुपए कमाती थीं, वह बढ़कर 65 हजार रूपए हो गया। इसी तरह बकरी पालन में उन्होंने लंबी छलांग लगाते हुए अपनी आय को 25 हजार रुपए से बढ़ाकर सीधे 55 हजार रूपए तक पहुँचाया।

          आज दशमी नाग अपनी मेहनत एवं लगन के बूते धान, मक्का, सब्जी उत्पादन सहित मुर्गी पालन और बकरीपालन जैसी विविध गतिविधियों के माध्यम से सालाना लगभग दो लाख रुपए से ज्यादा की आय अर्जित कर रही हैं। यह उनके पुराने जीवन की तुलना में एक बड़ी उपलब्धि है।

               आर्थिक लाभ के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व में भी एक अदभुत परिवर्तन आया है। जो दशमी पहले मजदूरी के लिए संघर्ष करती थीं, आज वे न केवल आत्मनिर्भर हैं, यही नहीं समाज में लोगों के साथ खुलकर आत्मविश्वास के साथ संवाद करती हैं। उनकी यह सफलता की कहानी साबित करती है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही अवसर और मंच मिले, तो वे अपनी तकदीर खुद बदल सकती हैं।

संपादक –ऋषभ कुमार

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By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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