रिपोर्ट –जय शंकर पांडे

जगदलपुर 09 अप्रैल 2026/ रिश्तों की गर्माहट और बचपन की शरारतों का एक ऐसा अनूठा संगम पिछले तीन दिनों से जिले की विभिन्न आंगनबाड़ी केंद्रों में देखने को मिला, जिसने आधुनिकता की भागदौड़ के बीच पारिवारिक जुड़ाव की एक नई मिसाल पेश की है। बीते 6 अप्रैल से 8 अप्रैल तक आयोजित दादा-दादी, नाना-नानी खेल उत्सव ने न केवल आंगनवाड़ी के बच्चों, बल्कि उनके अभिभावकों और घर के बुजुर्गों के जीवन में भी उत्साह का नया संचार कर दिया। इस आयोजन की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें 126 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपनी सक्रिय भागीदारी निभाते हुए कार्यक्रम को बेहद व्यवस्थित और यादगार बनाया।



       उत्सव का आगाज अत्यंत भावपूर्ण रहा, जहाँ नन्हे-मुन्ने बच्चों ने अपनी परंपरा और संस्कृति का परिचय देते हुए अपने दादा-दादी और नाना-नानी का स्वागत आरती, तिलक और फूलों के गुलदस्ते भेंट कर किया। बच्चों के छोटे-छोटे हाथों से सम्मानित होकर बुजुर्गों की आँखें खुशी से छलक उठीं और पूरा वातावरण प्रेम व आदर की खुशबू से सराबोर हो गया। स्वागत की इस बेला के बाद शुरू हुआ खेलों और मनोरंजन का वह सिलसिला, जिसने उम्र के फासले को पूरी तरह मिटा दिया। खेल के मैदान में उतरे दादा-दादी और नाना-नानी ने बच्चों जैसी ऊर्जा दिखाते हुए म्यूजिक चेयर, रस्साकशी और चम्मच-दौड़ जैसी प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इतना ही नहीं डांस, पेपर कप और ब्लॉक बनाने जैसी गतिविधियों में बुजुर्गों और बच्चों की जुगलबंदी ने दर्शकों का दिल जीत लिया।



       इस पूरे उत्सव का सबसे भावुक और रोमांचक क्षण वह रहा, जब आँखों पर पट्टी बाँधकर अपने बच्चों को पहचानने की गतिविधि आयोजित की गई। इस अनूठे खेल ने यह सिद्ध कर दिया कि पीढ़ियों के बीच का रिश्ता केवल देखने तक सीमित नहीं होता, बल्कि स्पर्श और आत्मीयता की गहरी जड़ों से जुड़ा होता है। जब बुजुर्गों ने अपनी बंद आँखों के बावजूद अपनी अगली पीढ़ी को पहचान लिया, तो पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट और मुस्कुराहटों से गूँज उठा। समापन की ओर बढ़ते हुए, इस तीन दिवसीय उत्सव ने समाज को यह संदेश दिया कि खुशियों के लिए किसी खास उम्र की सीमा नहीं होती। जहाँ बच्चों को अपने बड़ों का बेशुमार लाड़ मिला, वहीं दादा-दादी और नाना-नानी की खिलखिलाहट ने यह साबित कर दिया कि रिश्तों का यह संगम वाकई अनमोल है।

संपादक –ऋषभ कुमार

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By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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