रिपोर्ट– जय शंकर पांडे

रिटायरमेंट के बाद बुजुर्ग शिक्षकों को आर्थिक संकट में धकेल रही साय सरकार, कांग्रेस सरकार की तरह पूर्व सेवा अवधि जोड़कर करे पेंशन की बहाली
3 अगस्त 2026, जगदलपुर। नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष राजेश चौधरी ने छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी सरकार पर कर्मचारियों और शिक्षकों के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए जारी प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कहा है कि शिक्षकों को उनकी मूल नियुक्ति तिथि से पेंशन का लाभ नहीं देने का निर्णय पूरी तरह कर्मचारी विरोधी और अन्यायपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार के इस निर्णय का सबसे अधिक नुकसान उन शिक्षकों को होगा, जिन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दिए हैं।भारतीय जनता पार्टी की सरकार कभी भी कर्मचारियों और श्रमिक वर्ग की हितैषी नहीं रही है भाजपा की नीतियां पूंजीपतियों के हितों को प्राथमिकता देने वाली ही रही हैं, जिसका खामियाजा आम जनता, कर्मचारी, शिक्षक और मध्यम वर्ग भुगत रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज देश में बढ़ती महंगाई और आम लोगों पर बढ़ते आर्थिक बोझ के लिए भी केंद्र की भाजपा सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।
छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक पंचायत एवं नगरीय निकायों के अधीन सेवाएं देने वाले शिक्षकों के संविलियन का मुद्दा भी भाजपा सरकार के कार्यकाल में लंबित रहा। कांग्रेस सरकार बनने के बाद शिक्षकों के संविलियन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया और 1 जुलाई 2018 से शिक्षकों का संविलियन किया गया। इसके बाद छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने कर्मचारियों के हित में निर्णय लेते हुए 1 अप्रैल 2022 से पुरानी पेंशन योजना बहाली की प्रक्रिया पूर्ण की।राजेश चौधरी ने आगे कहा कि कांग्रेस सरकार ने शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखते हुए उनकी पूर्व सेवा अवधि को महत्व दिया। पंचायत सेवा काल में कार्यरत रहे शिक्षकों की सेवाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें पेंशन का लाभ देने की दिशा में संवेदनशील निर्णय लिए गए। उन्होंने कहा कि जिन शिक्षकों ने अपनी पहली नियुक्ति से लेकर संविलियन तक वर्षों तक शासकीय स्कूलों में पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ अपनी सेवाएं दी हैं, उनकी सेवा अवधि को पेंशन निर्धारण में शामिल किया जाना पूरी तरह न्यायसंगत है।
नेता प्रतिपक्ष राजेश चौधरी ने कहा कि वर्तमान में यदि शिक्षकों की सेवा की गणना केवल 1 अप्रैल 2018 अथवा 1 जुलाई 2018 से की जाती है और पेंशन के लिए निर्धारित सेवा अवधि की शर्तें लागू की जाती हैं, तो लंबे समय तक सेवा देने वाले अनेक शिक्षकों को उनकी वास्तविक सेवा के अनुरूप पेंशन का लाभ नहीं मिल पाएगा। ऐसी स्थिति में सेवानिवृत्ति के बाद कई बुजुर्ग शिक्षकों को बेहद कम पेंशन पर जीवन गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यदि पेंशन की गणना संविलियन की तिथि से ही की जाती है, तो अनेक शिक्षकों को मात्र 2500 से 4000 रुपये या उसके आसपास की पेंशन मिलने की स्थिति बन सकती है, जो आज की महंगाई के दौर में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त नहीं है।
जिन शिक्षकों ने अपने जीवन का बहुमूल्य समय बच्चों को शिक्षित करने और समाज के निर्माण में लगाया, उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक असुरक्षा में धकेलना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय बुजुर्ग शिक्षकों को दूसरों पर निर्भर होने और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने के लिए मजबूर कर सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक तरफ केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें आत्मनिर्भर भारत और आत्मनिर्भर नागरिक की बात करती हैं, वहीं दूसरी तरफ दशकों तक सरकारी सेवा देने वाले शिक्षकों को सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक रूप से कमजोर करने वाली नीतियां क्यों लागू की जा रही हैं?जब विधायक और सांसद चुनाव जीतने के बाद शपथ ग्रहण की तिथि से वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाओं के हकदार होते हैं तथा उनके कार्यकाल के आधार पर पेंशन संबंधी लाभ निर्धारित किए जाते हैं, तो फिर शिक्षकों और कर्मचारियों की मूल नियुक्ति तिथि से उनकी सेवा की गणना कर पेंशन का निर्धारण क्यों नहीं किया जा सकता? उन्होंने कहा कि शिक्षकों ने भी अपनी नियुक्ति की पहली तारीख से ही सरकार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाई हैं, इसलिए उनके साथ भी समान और न्यायपूर्ण व्यवहार होना चाहिए।भाजपा सरकार शिक्षकों से उनके मूल शैक्षणिक दायित्वों के अलावा लगातार विभिन्न प्रकार के गैर-शैक्षणिक सरकारी कार्य करवाती है, जिसके कारण शिक्षकों को बच्चों की पढ़ाई और शिक्षा की गुणवत्ता पर पर्याप्त ध्यान देने का समय नहीं मिल पाता। इसके बावजूद यदि परीक्षा परिणाम प्रभावित होता है तो शिक्षकों को नोटिस, कार्रवाई और निलंबन जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सरकार को शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव बनाने के बजाय शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और शिक्षकों को उनके मूल शैक्षणिक दायित्वों के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए।भाजपा सरकार की ऐसी नीतियों से प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था कमजोर होने का खतरा है। सरकारी स्कूलों को मजबूत करने के बजाय यदि शिक्षकों को लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाएगा और उनके अधिकारों एवं भविष्य की सुरक्षा की अनदेखी की जाएगी, तो इसका सीधा असर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।इससे सिर्फ निजी स्कूलों को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंच सकता है।
नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष राजेश चौधरी ने छत्तीसगढ़ सरकार से मांग की कि संविलियन से पहले पंचायत एवं अन्य स्थानीय निकायों के अधीन शिक्षकों द्वारा दी गई सेवा अवधि को पेंशन निर्धारण में पूर्ण रूप से जोड़ा जाए और शिक्षकों को उनकी मूल नियुक्ति तिथि से पेंशन का लाभ दिया जाए। उन्होंने कहा कि शिक्षकों ने जिस दिन से सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत बच्चों को पढ़ाने और प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने का कार्य शुरू किया, उसी दिन से उनकी सेवा की गणना की जानी चाहिए।यह केवल शिक्षकों के आर्थिक अधिकार का विषय नहीं है, बल्कि उनके सम्मान, सामाजिक सुरक्षा और बुढ़ापे की गरिमा से जुड़ा हुआ मुद्दा है। सरकार को शिक्षकों की वर्षों पुरानी सेवाओं को नजरअंदाज करने के बजाय संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण के साथ निर्णय लेना चाहिए।
भाजपा सरकार को अपना कर्मचारी विरोधी रवैया छोड़कर शिक्षकों के हित में तत्काल निर्णय लेना चाहिए तथा मूल नियुक्ति तिथि से सेवा की गणना करते हुए पेंशन का लाभ सुनिश्चित करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने शिक्षकों के इस न्यायसंगत अधिकार की अनदेखी की, तो कांग्रेस पार्टी शिक्षकों और कर्मचारियों के हितों की लड़ाई को मजबूती से सड़क से सदन तक उठाएगी।