रिपोर्ट – जय शंकर पांडे

“राखी का रिश्ता, भरोसे का साथ—विष्णु भैया संग विकास की बात।”

बीजापुर, 27 अगस्त 2026/ राखी के पावन पर्व के बीच महिलाओं के सम्मान, स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की यह कहानी ग्रामीण छत्तीसगढ़ में नई उम्मीद की तस्वीर पेश करती है। ग्राम चिन्नाकवाली, परियोजना बीजापुर की 32 वर्षीय श्रीमती जानकी यालम ने महतारी वंदन योजना से मिलने वाली आर्थिक सहायता को बचत में बदलकर अपनी छोटी-सी दुकान और सिलाई के काम को आगे बढ़ाया है। आज उनकी मेहनत उन्हें हर माह 2000 से 2500 रुपये की अतिरिक्त आमदनी दे रही है।

जानकी अपने पति और एक बच्चे के साथ रहती हैं। गांव के बीचों-बीच उनकी छोटी-सी दुकान है। दुकान में एक ओर रोजमर्रा के किराना सामान हैं तो दूसरी ओर उनकी सिलाई मशीन। यही मशीन आज उनके आत्मनिर्भर जीवन की पहचान बन चुकी है।



1000 रुपये की सहायता को बनाया आत्मनिर्भरता की पूंजी

परिवार की आर्थिक स्थिति पहले इतनी मजबूत नहीं थी कि सभी जरूरतों को आसानी से पूरा किया जा सके। मार्च 2024 में महतारी वंदन योजना के तहत हर माह 1000 रुपये की आर्थिक सहायता मिलने लगी तो जानकी ने इस राशि को खर्च करने के बजाय बचत करने का निर्णय लिया।

छोटी-छोटी बचत करते हुए उन्होंने 13 हजार रुपये एकत्र किए। इसी राशि का उपयोग उन्होंने अपनी दुकान में सामान बढ़ाने और सिलाई के काम को आगे बढ़ाने में किया। उनकी समझदारी और मेहनत ने छोटी पूंजी को आय के अतिरिक्त साधन में बदल दिया।

सिलाई मशीन बनी आर्थिक मजबूती का सहारा

आज जानकी गांव की महिलाओं और बच्चों के कपड़े सिलती हैं। इसके साथ ही वे अपनी किराना दुकान भी संभालती हैं। सिलाई और दुकान से होने वाली आमदनी से परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है।

अब उन्हें हर माह लगभग 2000 से 2500 रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है। इस राशि से वे अपने बच्चे की पढ़ाई, घर के राशन और अन्य आवश्यक खर्चों में पति का सहयोग कर रही हैं।

जानकी कहती हैं, “विष्णु भैया ने जो 1000 रुपये हर महीने भेजे, उसी को जोड़-जोड़कर मैंने 13 हजार रुपये बनाए। उसी से दुकान में सामान बढ़ाया और सिलाई का काम आगे बढ़ाया। आज मैं अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर घर चला रही हूं।”

जानकी की कहानी बनी गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा

जानकी की कहानी यह संदेश देती है कि सरकारी योजना से मिली सहायता का सही उपयोग, नियमित बचत और मेहनत मिलकर आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव रख सकते हैं। आज उनकी सिलाई मशीन केवल कपड़े नहीं सिल रही, बल्कि उनके परिवार के सपनों को भी आकार दे रही है।

जानकी अब अपने परिवार के लिए आर्थिक सहारा बनने के साथ ही गांव की दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी कहानी बताती है कि आत्मनिर्भरता के लिए हमेशा बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती, दृढ़ इच्छाशक्ति और छोटी शुरुआत भी बड़े बदलाव का रास्ता खोल सकती है।

“राखी का रिश्ता, भरोसे का साथ—विष्णु भैया संग विकास की बात।”

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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