सेवा की कहानी, उपजाऊ मिट्टी के संरक्षण के साथ लहलहाने लगी फसलें

जगदलपुर, 15 अक्टूबर 2026/ महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना बस्तर के सुदूर ग्रामीण अंचलों में जल संरक्षण और आर्थिक खुशहाली का नया माध्यम बन रहा है। जनपद पंचायत बस्तर अंतर्गत ग्राम पंचायत बागमोहलई-01 में प्राकृतिक बहाव के कारण संकट से जूझ रहे किसानों के लिए एक गेबियन चेक डैम वरदान साबित हुआ है। यहाँ के किसान रामधर और लच्छिन्दर की कृषि भूमि एक प्राकृतिक ढलान और नाले के पास स्थित थी।

हर साल मानसूनी बारिश के दौरान पानी के तेज बहाव के कारण खेतों की उपजाऊ मिट्टी बह जाती थी, जबकि बारिश खत्म होते ही सारा पानी निकल जाने से धान की फसल सिंचाई और नमी के अभाव में सूखने की कगार पर पहुँच जाती थी। किसानों की इस लंबे समय से चली आ रही गंभीर समस्या का स्थायी समाधान तलाशते हुए ग्राम पंचायत बागमोहलई-01 द्वारा वित्तीय वर्ष 2025-26 में मनरेगा के अंतर्गत गेबियन चेक डैम निर्माण को स्वीकृति दी गई।

स्थानीय पत्थरों और मजबूत वायर-मेश से निर्मित 11.50 मीटर लंबे इस ढांचे को 1.945 लाख रुपए की स्वीकृत लागत के सापेक्ष 1.55 लाख रुपए के व्यय से 14 अप्रैल 2026 को सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया। इस विकास कार्य के दौरान गाँव के श्रमिकों को 189 मानव दिवस का प्रत्यक्ष रोजगार भी सुलभ हुआ, जिससे निर्माण काल में भी ग्रामीणों को आजीविका का सीधा संबल मिला। डैम के निर्माण के बाद से जमीनी स्तर पर व्यापक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

नाले के तेज बहाव की गति नियंत्रित होने से खेतों की उपजाऊ मिट्टी का कटाव पूरी तरह थम चुका है और नाले में पानी का ठहराव रहने से आसपास के खेतों तथा भूजल स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। चेक डैम में संचित जल से धान की फसल को समय पर जीवनदायी सिंचाई मिल रही है, जिससे खेत फिर से लहलहाने लगे हैं। इस बदलाव पर खुशी जाहिर करते हुए किसान का कहना है कि पहले जहाँ बारिश का पानी उनकी जमीन और फसल दोनों को नुकसान पहुँचाता था, वहीं अब इस गेबियन चेक डैम ने खेतों को सुरक्षा प्रदान करने के साथ भरपूर पानी भी सुनिश्चित किया है।

इस चेक डैम का सकारात्मक असर केवल धान की फसल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने किसानों के लिए अतिरिक्त आय और पशुपालन के नए रास्ते भी खोल दिए हैं। डैम में संचित पानी के कारण 5 से 6 महीनों तक मवेशियों के लिए पीने का पानी आसानी से उपलब्ध रहेगा और किसान जलभराव का उपयोग मछली पकड़ने में भी कर रहे हैं।

इतना ही नहीं हितग्राही के परिवार द्वारा डैम के किनारे टमाटर और बरबटी जैसी मौसमी साग-सब्जियाँ उगाई जा रही हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हो रही है। आसपास के तीन-चार अन्य किसानों के कुओं का जलस्तर भी बढ़ जाने से वे अब गर्मियों में सब्जी उत्पादन कर रहे हैं।

कुल 8 लाभार्थी परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाते हुए यह परियोजना बस्तर में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और ग्रामीण स्वावलंबन का एक सशक्त उदाहरण पेश कर रही है।

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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