देवड़ा की कुम्हार महिलाएं गढ़ रहीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

जगदलपुर, 6 नवम्बर 2026/ दीपावली के पावन पर्व के नजदीक आते ही मिट्टी के दीयों और पारंपरिक बर्तनों की मांग बढ़ गई है। इस त्योहारी सीजन में ग्रामीण शिल्पकार न केवल अपनी कला को संजोए हुए हैं, बल्कि सरकारी योजनाओं के सहयोग से आत्मनिर्भरता की नई इबारत भी लिख रहे हैं। ग्राम देवड़ा (सोनारपाल) में पारंपरिक मिट्टी कला से जुड़े कुम्हार परिवारों की महिलाएं कड़ी मेहनत और सामूहिक प्रयास से अपने व्यवसाय को नई दिशा दे रही हैं।

दीप समूह की 14 महिलाओं का सामूहिक प्रयास’

देवड़ा क्षेत्र के कुम्हारपारा में कारीगरों के लगभग पाँच महिला स्व-सहायता समूह सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। इनमें से दीप समूह में 14 महिलाएं मिलकर मिट्टी के दीये, कलश, हंडी और अन्य बर्तन तैयार कर रही हैं। गणेश उत्सव के समय से शुरू हुई यह तैयारी अब दीपावली तक पूरे उत्साह से जारी है। इन बर्तनों की बिक्री न केवल स्थानीय स्तर पर घर और दुकानों से की जा रही है, बल्कि बालेंगा और सोनारपाल जैसे नजदीकी बाजारों में भी इनकी अच्छी मांग है।

महतारी वंदन योजना से मिला आर्थिक संबल

समूह की सदस्य कुंती पाढ़े ने बताया कि छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी महतारी वंदन योजना उनके व्यवसाय के लिए वरदान साबित हो रही है। इस योजना से मिलने वाली आर्थिक सहायता राशि को महिलाएं अपनी कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) के रूप में उपयोग कर रही हैं। त्योहारों के समय मिट्टी, रेत और बर्तन पकाने के लिए आवश्यक लकड़ी व पैरा (पुआल) खरीदने में इस राशि का बड़ा सहारा मिल रहा है। इसके अलावा, जरूरत पड़ने पर समूह के माध्यम से ऋण लेकर भी काम को आगे बढ़ाया जा रहा है।

कड़ी मेहनत से तैयार होते हैं माटी के दीप

कारीगर बताते हैं कि बर्तन और दीये बनाने के लिए मारकण्डी नदी क्षेत्र से गर्मी के दिनों में ही ट्रैक्टरों के जरिए चिकनी मिट्टी लाई जाती है। बारिश के बाद इस मिट्टी को तैयार कर चाक पर सुंदर आकार दिया जाता है। इसके बाद बर्तनों को लकड़ी और पैरे की आंच में तपाकर पक्का किया जाता है।

पारंपरिक हुनर के साथ शिक्षा और आधुनिक काम का समन्वय

परिवार के बुजुर्ग और महिलाएं जहां मिट्टी के पारंपरिक काम को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं परिवार के अन्य सदस्य वेल्डिंग और दुकानदारी जैसे कार्यों से भी जुड़े हैं। इसके साथ ही नई पीढ़ी की पढ़ाई-लिखाई पर भी पूरा ध्यान दिया जा रहा है। शासन की कल्याणकारी योजनाओं और महिलाओं के इस जज्बे ने माटी की इस पारंपरिक कला में नई जान फूंक दी है।

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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