कोरोना के बाद भारत IVF का वैश्विक केंद्र बनता जा रहा है। घटती प्रजनन दर, देर से विवाह, अस्वस्थ जीवनशैली और बेरोजगारी के चलते बांझपन की समस्या बढ़ रही है। हर साल 25 हजार से ज्यादा विदेशी IVF ट्रीटमेंट के लिए भारत आते हैं, जबकि देश में पहले से ही 3 करोड़ से अधिक जोड़े संतानहीनता की समस्या से जूझ रहे हैं।

गुजरात, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां IVF सेंटरों द्वारा महिलाओं के अंडाणु धोखे से निकालकर अन्य जोड़ों को बेचे गए।

IVF का वैश्विक बाजार (अरब डॉलर में)

2018 – 12.56
2019 – 12.92
2021 – 15.38
2023 – 18.17
2026 (अनुमानित) – 23.12

कहां सस्ता है IVF ट्रीटमेंट?

  • भारत: ₹1.5-2.0 लाख
  • तुर्की: ₹1.6-2.0 लाख
  • यूनान: ₹1.7-2.8 लाख
  • स्पेन: ₹2.9-4.0 लाख
  • डेनमार्क: ₹3.5-4.8 लाख

स्पर्म और एग डोनेशन का काला सच

IVF क्लीनिकों में पैसे कमाने के लिए युवा लड़के-लड़कियां अपने स्पर्म और एग बार-बार बेच रहे हैं। पुणे की एक गायनेकोलॉजिस्ट के मुताबिक, कई छात्र-छात्राएं नाक या होंठ की सर्जरी कराने या विदेश यात्रा के खर्च के लिए एग डोनेट कर रहे हैं।

IVF सेंटरों का खेल: गैरकानूनी लिंग जांच और फर्जी साख

IVF की सफलता दर अभी भी 35% से कम है। कई सेंटर लिंग जांच कर लड़का चाहने वालों से तीन गुना ज्यादा पैसा वसूलते हैं, जो गैरकानूनी है। साथ ही, अपनी सफलता दर बढ़ाने के लिए वे कपल्स को बिना बताए अन्य पुरुषों के स्पर्म का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत में हर साल 6 लाख महिलाओं को IVF की जरूरत होती है, लेकिन सिर्फ 2.5 लाख को ही ट्रीटमेंट मिल पाता है। बढ़ते IVF बाजार के साथ इस धंधे के काले सच भी सामने आ रहे हैं, जिन पर सख्त निगरानी की जरूरत है।

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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