जगदलपुर। अगर आप नॉनवेज के शौकीन हैं और खासकर चिकन पकौड़ा पसंद करते हैं, तो यह खबर आपको झकझोर कर रख देगी। बाजार में मरी हुई लेयर और ब्रायलर मुर्गियों का मांस धड़ल्ले से बेचा जा रहा है, और ग्राहकों को इसकी भनक तक नहीं लग रही।

कैसे हो रही है धोखाधड़ी?

गर्मी का पारा 38 डिग्री तक पहुंच चुका है, जिससे परिवहन के दौरान भूख-प्यास और गर्मी की वजह से रोजाना 50 से ज्यादा मुर्गियां मर जाती हैं। पहले इन मृत मुर्गियों को फेंक दिया जाता था, लेकिन अब रिटेलर इन्हें मात्र 10-20 रुपये में खरीदकर बेच रहे हैं, जिससे 10 गुना तक का मुनाफा हो रहा है।

मरे हुए चिकन का खून सूख जाता है, जिससे अगर इसे सब्जी में पकाया जाए तो इसका स्वाद अलग महसूस होता है। लेकिन त्योहारी माहौल और शराब के नशे में चिकन पकौड़े का स्वाद पहचानना मुश्किल हो जाता है। इसी का फायदा उठाकर व्यापारी मरे हुए मुर्गियों का मांस धड़ल्ले से बेच रहे हैं।

बर्ड फ्लू का खतरा और देसी मुर्गियों का संकट

वर्तमान में बर्ड फ्लू को लेकर अलर्ट जारी किया गया है। देसी मुर्गे-मुर्गियों की लगातार मौत हो रही है, जिससे इनकी संख्या तेजी से घट रही है। यही वजह है कि गत वर्ष 300 रुपये किलो मिलने वाला देसी चिकन अब 650 रुपये किलो तक पहुंच चुका है।

वहीं, लेयर चिकन 150 रुपये/किलो और ब्रायलर 200 रुपये/किलो बिक रहा है। ओडिशा सरकार ने बस्तर से सटे इलाकों में मुर्गा लड़ाई पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन बस्तर में प्रशासन और विभागीय अमला बाजार में हो रही इस गड़बड़ी पर आंखें मूंदे हुए है।

पशुधन विभाग और खाद्य विभाग की घोर लापरवाही!

पशुधन विभाग, जगदलपुर के अधिकारी अपनी ड्यूटी को गंभीरता से नहीं निभा रहे हैं।

स्लॉटर हाउस (कसाईखाने) में अधिकारी मौजूद नहीं रहते, जिससे बिना स्वास्थ्य परीक्षण के ही बीमार और मृत जानवरों का मांस बेचा जा रहा है।

खाद्य विभाग, जगदलपुर भी लापरवाह बना हुआ है।

बिना लाइसेंस धड़ल्ले से बिक रहा चिकन-मटन!

खाद्य विभाग की अनदेखी से जगदलपुर के सभी ढाबे, नेगीगुड़ा और टुरेनार की चिकन भजा (फ्राई) शॉप्स बिना फूड लाइसेंस के ही चिकन-मटन परोस रही हैं। ये दुकानदार सस्ते और अस्वस्थ मांस का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे लोगों की सेहत को भारी नुकसान हो सकता है।

अब बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन कब जागेगा?
क्या अधिकारी इन गड़बड़ियों पर कार्रवाई करेंगे या फिर जनता को खुद ही विरोध करना पड़ेगा? अब देखना होगा कि जनता का गुस्सा कब फूटता है और प्रशासन कितनी जल्दी हरकत में आता है!

By संपादक–ऋषभ कुमार

a seniour journalist from bastar division working since 2008

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