जहां एक ओर बीजेपी सरकार और मुख्यमंत्री बिहार दिवस मना रहे हैं, वहीं बस्तर का मांटीपुत्र, कद्दावर आदिवासी नेता महेश कश्यप छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति को बढ़ावा देने में जुटे हैं। जनजातीय परंपराओं को संरक्षित करने और आदिवासी समाज को सशक्त बनाने के उनके प्रयासों को जनता भरपूर समर्थन दे रही है।
जनता में उठी नई मांग – अगला मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ के संस्कृति और परंपरा को बढ़ावा देने वाले नेता हो! ना कि बिहार दिवस मनाए
अब छत्तीसगढ़ की जनता के बीच चर्चा जोरों पर है कि राज्य को एक ऐसा नेतृत्व चाहिए जो ज़मीन से जुड़ा हो, जो राज्य की संस्कृति, परंपरा और वास्तविक पहचान को समझता हो। महेश कश्यप की सक्रियता और उनके योगदान को देखते हुए लोग उन्हें अगले मुख्यमंत्री के रूप में देखने की इच्छा जताने लगे हैं।
छत्तीसगढ़ की असली पहचान कौन?
यह सवाल अब राज्य के कोने-कोने में गूंज रहा है – क्या बिहार दिवस मनाना ज़रूरी था, या फिर अपनी मातृभूमि, अपने जनजातीय समाज, और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का प्रयास? महेश कश्यप ने जिस तरह ‘बस्तर पंडुम’ जैसे महोत्सवों के माध्यम से आदिवासी समाज को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का काम किया है, वह साबित करता है कि छत्तीसगढ़ के असली नेता वही हैं जो अपनी जड़ों से जुड़े रहें।
आदिवासी नेतृत्व की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़?
राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या छत्तीसगढ़ की जनता अगली बार एक आदिवासी मुख्यमंत्री को चुनकर इतिहास रचने जा रही है? आदिवासी तो वर्तमान मुख्यमंत्री भी हैं पर बिहार दिवस मनाकर छत्तीसगढ़ की जनता को तिरस्कृत किया गया। महेश कश्यप की बढ़ती लोकप्रियता इस ओर इशारा कर रही है कि जनता अब केवल वादों पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर किए जा रहे कामों पर विश्वास कर रही है।
अब देखना यह होगा कि यह जनचर्चा राजनीति के भविष्य में क्या बदलाव लाएगी!
