रिपोर्ट: ओम साहू
जगदलपुर, 13 जून 2025
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खनिज विभाग द्वारा बस्तर में अवैध रेत उत्खनन और परिवहन पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेश के पालन में अब तक छह वाहन और एक माउंटेन मशीन जब्त की जा चुकी है। यह बदलाव खास इसलिए भी है क्योंकि पहले ऐसी शिकायतों के बावजूद कार्रवाई मुश्किल से ही होती थी।
यह सख्ती निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक पहल है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी सामने आने लगा है – और वह है प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थियों की परेशानी।
रेत नहीं तो घर कैसे बने?
प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत समय सीमा में मकान बनाना अनिवार्य है। इसके लिए पंचायत प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं। लेकिन लाभार्थियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि रेत ही उपलब्ध नहीं है।
सरकारी खदानें बंद हैं, और दूसरी ओर रेत का ब्लैक मार्केट ज़ोरों पर है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, 3 से 5 हजार रुपये प्रति ट्रैक्टर तक रेत की मांग की जा रही है। यह दर गरीब और ग्रामीण हितग्राहियों के लिए असहनीय है।
रेत माफियाओं का मायाजाल
अब सवाल यह है कि यदि प्रशासन कार्रवाई कर रहा है, तो ब्लैक मार्केट कैसे फल-फूल रहा है?
गांवों और शहर के बाहरी इलाकों में डंप की गई रेत चोरी-छिपे बेची जा रही है।
रेत माफिया गुप्त तरीकों से कार्यरत हैं, और कुछ मामलों में इन्हें स्थानीय रसूखदारों का संरक्षण भी प्राप्त है।
कई जगहों पर प्रशासन की पकड़ से बाहर होते जा रहे हैं ये अवैध रेत कारोबारी।
समाधान की ज़रूरत
1. नियंत्रित रेत वितरण प्रणाली लागू की जाए जिससे जरूरतमंद लाभार्थियों को सीमित मात्रा में रेत उचित दर पर मिले।
2. रेत खदानों का टेंडर पारदर्शिता से हो और वैध आपूर्ति तत्काल चालू की जाए।
3. ब्लैक मार्केट की सख्त निगरानी हो — सिर्फ ट्रक जब्त करना काफी नहीं, नेटवर्क को तोड़ना जरूरी है।
4. हितग्राहियों को वैकल्पिक निर्माण सामग्री के विकल्प दिए जाएं जैसे ब्लॉक निर्माण तकनीक।
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यह मुद्दा सरकार और जनता दोनों के हित में है। रेत पर नियंत्रण जरूरी है, लेकिन उस नियंत्रण का असर गरीबों के सपनों पर ना पड़े, इसका भी ख्याल रखना होगा।
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