रिपोर्ट – जय शंकर पांडे

एक पक्ष ने परंपरा टूटने का लगाया आरोप, आरण्यक ब्राह्मण समाज ने कहा– पूजा में शामिल होने से परंपरा खंडित नहीं होती
19 जुलाई 2026, जगदलपुर। बस्तर गोंचा महापर्व के दौरान भगवान जगन्नाथ के नेत्रोत्सव पूजा विधान में बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमल चंद्र भंजदेव की उपस्थिति को लेकर नया विवाद सामने आया है। परंपरा के जानकारों और धार्मिक पदाधिकारियों के बीच इस विषय पर अलग-अलग मत सामने आने से चर्चा तेज हो गई है।
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दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी प्रेम पंडित पाढ़ी ने दावा किया कि नेत्रोत्सव पूजा में राजपरिवार के सदस्य का शामिल होना परंपरा के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि बस्तर के अंतिम महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव भी इस पूजा विधान में शामिल नहीं हुए थे। उन्होंने यह भी कहा कि राजपरिवार को सलाह देने वाले लोगों को परंपरागत नियमों की समुचित जानकारी होनी चाहिए।
वहीं,सुकमा जमींदार परिवार के सदस्य कुमार जयदेव ने कहा कि उन्हें मीडिया के माध्यम से जानकारी मिली कि कमल चंद्र भंजदेव पूजा में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि पूजा में उपस्थित होना अलग विषय है, लेकिन इससे परंपरा का उल्लंघन हुआ या नहीं, इसका उत्तर 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज ही दे सकता है।
इधर,360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष वेद प्रकाश पांडे ने परंपरा टूटने के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना है कि नेत्रोत्सव पूजा का विधान समाज के परंपरागत पाढ़ी और पाणीग्राही द्वारा ही संपन्न कराया जाता है। यदि राजपरिवार का सदस्य पूजा में उपस्थित रहा, तो मात्र इससे परंपरा खंडित नहीं मानी जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में शासन-प्रशासन सहित बड़ी संख्या में बस्तरवासी कमल चंद्र भंजदेव को महाराजा के रूप में सम्मान देते हैं। इसलिए मैं भी उन्हें महाराजा मानता हूं,इसमें क्या गलत है। बता दे देश मे राजतंत्र व्यवस्था खत्म होकर लोकतंत्र व्यवस्था चल रहा है,ऐसे में आरण्यक ब्राम्हण समाज के अध्यक्ष जो छत्तीसगढ़ प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा दल में बस्तर जिला के अध्यक्ष जैसे जिम्मेदार पद में है,उनके द्वारा लोकतंत्र में राजतंत्र की बात स्वीकार एक नया व्यख्या को जन्म देने से जोड़कर देखा जा रहा है। समाचार लिखे जाने तक इस विषय पर बस्तर राजपरिवार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी थी।
परंपरा की अलग-अलग व्याख्याओं से बढ़ी चर्चा
नेत्रोत्सव पूजा को लेकर सामने आए अलग-अलग दावों ने बस्तर की धार्मिक परंपराओं की व्याख्या पर नई बहस छेड़ दी है। एक पक्ष इसे शताब्दियों पुरानी मर्यादा से जोड़ रहा है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि पूजा का मूल विधान परंपरागत पुजारियों द्वारा ही संपन्न हुआ है और राजपरिवार की उपस्थिति मात्र से परंपरा भंग नहीं होती। ऐसे में धार्मिक एवं परंपरागत संस्थाओं की आधिकारिक व्याख्या को ही अंतिम मानने की बात भी सामने आ रही है।