रिपोर्ट –जय शंकर पांडे

जगदलपुर, 1 मई 2026/ बस्तर की पावन धरा पर सदियों से जीवंत पारंपरिक शिल्पकला अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी नई चमक बिखेरने को तैयार है। राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तत्वावधान में राजस्थान की प्रतिष्ठित संस्था, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्राफ्ट एंड डिजाइन जयपुर के एक विशेषज्ञ दल ने 30 अप्रैल 2026 को बस्तर के ग्रामीण अंचलों का दौरा कर यहाँ के हस्तशिल्प की बारीकियों को समझा। इस भ्रमण का मुख्य उद्देश्य बस्तर के पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप ढालना और स्थानीय आर्टिजन्स को बेहतर मार्केटिंग के अवसर प्रदान करना था। विशेषज्ञ दल ने सीधे शिल्पकारों के घर-आँगन तक पहुँचकर उनकी कला का अवलोकन किया। अलवाही-चिलकुटी में बेलमेटल की जटिल निर्माण प्रक्रिया से लेकर चपका में रेशम धागाकरण की कुशलता तक, विशेषज्ञों ने हर पहलू को बारीकी से परखा। लामकेर में लकड़ी और पत्थर की नक्काशी तथा परचानपाल में सीसल कला में जुटे समूहों से संवाद करते हुए दल ने कच्चे माल की उपलब्धता, श्रम की अवधि और स्थानीय बाजार में आ रही चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।

इस दौरान विशेषज्ञों ने माना कि बस्तर के शिल्पकारों के पास अद्भुत कौशल है, जिसे यदि सही डिजाइन और ब्रांडिंग का सहयोग मिले, तो इसके मूल्य में कई गुना वृद्धि की जा सकती है। इस कलात्मक विनिमय को आगे बढ़ाने के लिए आईआईसीडी जयपुर ने बस्तर के शिल्पकार समूहों को जयपुर आने का निमंत्रण दिया है। यहाँ उन्हें विशेष प्रशिक्षण और शैक्षणिक भ्रमण के माध्यम से आधुनिक पैकेजिंग, ई-कॉमर्स मार्केटिंग और बाजार की नवीन प्रवृत्तियों से अवगत कराया जाएगा। संस्थान की योजना है कि बस्तर के युवाओं और महिला समूहों को डिजाइन के आधुनिक मापदंडों में दक्ष किया जाए, ताकि उनके उत्पाद बड़े शहरों के शोरूम और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अपनी धाक जमा सकें।
इस भ्रमण के दौरान राज्य कार्यालय से एएसपीएम मनोज मिश्रा के नेतृत्व में जिला और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की सक्रिय उपस्थिति रही। जिला कार्यक्रम प्रबंधक राजकुमार देवांगन सहित बिहान की पूरी टीम ने शिल्पकारों और विशेषज्ञों के बीच एक सेतु का कार्य किया। विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर की कला पहले से ही समृद्ध है, लेकिन इसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़ा करने के लिए अब तकनीकी फिनिशिंग और ब्रांडिंग पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इस पहल से न केवल बस्तर के शिल्पकारों को नई पहचान मिलेगी, बल्कि उनके आर्थिक सशक्तिकरण का एक नया अध्याय भी शुरू होगा।